Mad Max : Fury Road और “ग्रैंड मास्टर रोबो”

Posted: June 14, 2015 by moifightclub in Hollywood
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Sumit Saxena is after me. Every time i call him, he asks me if i want to watch Mad Max again. Because he wants to watch it one more time. He has already seen it 11 times. Yes, you read that right. Why? Here you go.

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Early nineties की बात है. 96 के वर्ल्ड कप में काम्बली अभी तक रोया भी नहीं था शायद. मैंने कुछ ही महीने पहले “प्रतिशोध की ज्वाला” पढ़ी थी और सुपर कमांडो ध्रुव की कॉमिक्स मेरी favorite थी. “Favorite” से याद आया कि करीना की रिफ्यूजी अभी तक रिलीज़ नहीं हुई थी.
एक दोस्त जिसके पास बैट था, तीन खूबसूरत बहनें थीं और पिताजी के पास राजदूत थी, उसकी birthday में एक रेनोल्ड्स का फाइटर वाला पेन गिफ्ट व्रैप करके ले गया था. इस उम्मीद में कि, कुछ महीने बाद मेरी birthday पे अपनी राजदूत की इज्ज़त रखने के लिए वो एक बढ़िया सा gift लेके आएगा. उसके नाम के आगे ठाकुर भी था. जातिवाद की उतनी समझ नहीं थी तब, पर फिर भी ठाकुरों की इज़त से उम्मीद थी. (रेनोल्ड्स का फाइटर जावेद अख्तर ने अभी तक किया नहीं था शायद, पर यादें chronology का ख़याल नहीं करतीं. जावेद अख्तर से याद आया, बाबरी मस्जिद तब तक गिर चुकी थी, लेकिन पोखरण का ब्लास्ट अभी तक नहीं हुआ था. शायद! Chronology कि गलती 96 के वर्ल्ड कप के साथ भी शायद की हो मैंने)

केक कटने के थोड़ी देर बाद, केक जिस मेज़ पे कटा, उसके नीचे मुझे “ग्रैंड मास्टर रोबो” मिली, Pioneer के ऊपर. (Pioneer भी गलती हो सकती है, शायद Pioneer तब तक बंद हो चुका था; Forhans की तरह. मंजन और अखबार की तुलना यहाँ पे सिर्फ एक इत्तेफाक है.)

मैंने केक लपटने के तुरंत बाद ग्रैंड मास्टर रोबो लपट ली. २० रूपये की कॉमिक्स थी, किराये पे भी ३ रूपये प्रतिदिन की पड़ती . पिताजी की UP 32 1513 प्रिया को यह गंवारा नहीं था, राजदूत के ठाठ प्रिया वालों को नसीब नहीं होते. मैं सटासट पन्ने पलटता गया. ग्रैंड मास्टर रोबो अपने लेज़र वाली आँख से परछाइयों को गला रहा था, ध्रुव बिजली के तारों पे मोटर बाइक भगा रहा था, “अग्निमुख” नामक एक जीव बिजली के तारों से बिजली सोख कर अपने शक्ती बढ़ा रहा था.

११ पन्ने ही पलटे थे की UP 32 की बिजली शायद “अग्निमुख” ने चूस ली.

केक की बुझी हुई मोमबत्तियां फिर से जलाई गयीं, साथ में पैट्रोमाक्स भी. केक का second round चल रहा था, पर मैं केक की मोमबत्तियों के सहारे ग्रैंड मास्टर रोबो पढने में ज्यादा व्यस्त था. मुझे यह भी लग रहा था की अगर केक दोबारा नहीं खाऊं तो शायद यह लड़का मुझे अपनी कॉमिकस बिना किसी कॉमिक्स के exchange के पढने दे.

पूड़ी – सब्जी, पैट्रोमाक्स की रौशनी में छन के तीनों बहनों के हाथों, किचन से बाहर आ रही थीं. बहनों में अब दिलचस्पी नहीं थी और पूड़ी – सब्जी में भी नहीं. सोचा की खाना तो घर पे भी बना होगा, इससे पहले कि सब खा के उठ जाएँ, 62 पन्ने खत्म करना ज्यादा ज़रूरी है. “शान्ति” देखते देखते खाने कि खराब आदत पड़ गयी थी, काफी धीरे खाता था; भरोसा नहीं था कि खाना ख़तम करके पढ़ पाऊंगा.

सब खा के उठ गए, अपना return gift लेके चले भी गए और मैं एक चौथाई बची हुई केक कि कैंडल के नीचे अभी भी, भूखा, 59 वें page पे अटका हुआ था. “कुछ खाया भी नहीं तुमने”, कहके राजदूत वाली आंटी सता रही थीं. एकेले कमरे में अब सिर्फ मैं और मेरे दोस्त की तीन बहने बची थीं, जो मेरे निकल जाने के बाद ही खाना खातीं, वोह तीनों लडकियां भूखी नज़र से मुझे और मेरे हाथों में पलटती हुई “ग्रांडमास्टर रोबो” को देख रहीं थी. मैं बेशर्मी से पढ़े जा रहा था. 59 वें पन्ने पर “अग्निमुख”, transformer पे अपने हाथ जमाये बिजली सोख रहा था. उर्जा के लालच में वो बिजली सोखता रहा और आखिरकार फट गया.

उसके फटने के साथ ही कमरे में बिजली आ गयी.

बिजली के आते ही मेरा बेशर्मी से उस कमरे में बैठके बचे हुए पन्नों को पलटना मुश्किल हो गया. “थैंक यू आंटी, मैं चलता हूँ. मम्मी इंतज़ार कर रही होंगी.” तीनों बहनों को मैंने bye बोला , रौशनी में उन्हें देखते ही ख्याल आया- “एक से भी बात नहीं की मैंने आज शाम, कॉमिक्स भी नहीं पढ़ पाया- Shit!” (Shit शब्द भी मेरी vocabulary में नहीं था तब शायद, memory और chronology!!)

पर उनके घर से बाहर निकल कर जब तक मोहल्ले की सड़क पर पहुंचा, तब तक बहनों, केक, पूड़ी – सब्जी को बिलकुल भूल चुका था. याद था तो सिर्फ 59 वां पन्ना जहाँ उसे Pioneer पे उल्टा पलट के चलाया था.उनके घर से निकल के अपने घर की तरफ चलना शुरू ही किया था कि बत्ती फिर से चली गयी.

शायद, “अग्निमुख” कॉमिक्स में अभी भी जिंदा होगा-ख्याल आया.

१५ मई को जब “Mad Max” देखी, तो बहुत सारी बचपन कि कॉमिक्सों की याद आई. खासकर ग्रैंड मास्टर रोबो कि याद आयी. मुझे उस लड़के का नाम याद नहीं आया, न ही उसकी बर्थडे. पर जो भी कुछ याद आया सब गलत chronology के साथ याद आया, क्यूंकि 7000 दिन गुजरने के बाद, दिन यादों में भटक जाते हैं. मुझे ग्रैंड मास्टर रोबो पढने का रोमांच और अधूरा छोड़ने का दुःख याद आया. मुझे यह याद आया कि उसकी बहनों ने तब तक खाना नहीं खाया, जब तक सब खा के चले नहीं गए. और यह याद आया कि अग्निमुख के हाथों को ट्रांसफार्मर पर चिपका हुआ छोड़कर जब मैं बाहर आया था , तो बत्ती फिर से गुल हो गई थी, और पूरा मोहल्ला post-apocalyptic हो गया था.

– Sumit Saxena

(Sumit is an IIT graduate who loves to tell stories in all possible formats. On second thoughts, he would say fuck IIT, make it “a storyteller who loves to tell stories in all possible formats”)

Comments
  1. Shalaka Pathak says:

    Extremely boring read..please improve your story telling skills…you are trying to narrate / connect too many things of which most just do not make sense beyond cliched sense of nostalgia… and I am not even complaining yet about the misleading headline….too bored right now after reading this to even explain why I did not like this one

    • Ashish says:

      This here is a classic case of growing up with a lack of criticism and a sad attempt at creating an identity. Let me explain this might get a little boring but that doesn’t mean its not true, ‘boring’ and ‘true’ happen to be mutually exclusive you see.

      See when kids like him with average writing skills, functional command over Hindi and those who grew up reading a few Raj Comics(lakhs of kids read them but only a few privileged ones grow up to write blogs) enter into IITs where the general pubic has a very limited skill set namely Calculus and being ignorant about everything except PCM.(I understand that generalization is a bitch but I am trying to prove a point here) These kids stand out in the sea of Human replicas. It gives a serious booster dose of confidence to the kid who was already tripping on Confidence since he cleared JEE.

      And then it begins, one sub par article in hindi here , a banal piece of poetry there and this kid has now created an identity for himself, and as one knows the most fundamental of human needs is to have an Identity, so he becomes a guy who writes ‘awesomely'(that word gets thrown around like ‘shit’ nowadays) and reads hindi comics(like that makes you special somehow) hangs around with other kids who speak and understand his language and from here on He will do all he can to preserve his identity, that is he will continue to dish out phony pieces, shamelessly copying writing styles like here he poaches Rushdie( Midnight Children) and does an embarrassing overkill of chronological narrative.

      And since no one knows any better they shower disproportionate amount of appreciation on him. and his confidence begins to rise without much improvement in his writing skills. and then he begins writing about common knowledge (events from his life especially childhood ;exploiting nostalgia, events which are extremely common because he is ultimately one of those human replicas Think about Chetan Bhagat and all those ‘who have a love story’ selling millions of copies writing about a life that could be literally anybody’s; grossly unoriginal wouldn’t be an exaggeration ) and the thing about common knowledge is that is is extremely relate able and where a simple nod of appreciation was enough reader’s habit of indulging in rhetoric and with the innate desire of Hero worship, reader heaps praise that was misplaced and in turn boosts the confidence of the Kid who continues his dreary writing.

      This has gone on long enough.

      TL;DR Confident writing should not be a substitute for Competent writing and definitely not for Creative Writing. But it is.

      P.S I have little respect for someone who would use fuck before their Alma mater. And I am sick of these goddamn phonies.

      • Shalaka Pathak says:

        Ashish superb reply…exactly what I wanted to say but was too put off by what I read by this @#$% IIT dude..worse was the guy who runs this blog going ga ga over this mediocre writer bloke on twitter

  2. SAI BABA says:

    Ye kya tha ?? Matlab kuch bhi ?? kuch bhii ….?? This post literally is a thumbs down and does not even deserve to be on this blog.I mean first the article said Mad Max and when I read the first lines I thought that the storyline of the comic and the Mad Max might be same and the comic would have came a long time ago and how two people can have thought or something much more interesting.I read a few lines more and think that writer might want to build some suspense and then there will be this adrenaline rush but SHITT man ,SHITTTT !!! I mean that migh tbe cheapest article I ever read more cheaper then ScoopWhoop articles. Is se yaad aaya ye ,us se yaad aaya vo us se yadd aayi meri gand !Kya tha ye bhenchod ! Should hve given link o his blog maybe then we would have just passed but this write here is Pure Golden SHITTT!
    Fucking Storyteller!!

    Improve storytelling ,this all might look good as a video being a fast direction and all !!
    But there are so many stereotypes,no main plot many subplots and no concentration on a single one!!
    Is se yaad aaya vo,us se yadd aayi meri Gand!

    *I am very HIGH as I am writing this .

  3. बनारसी पान says:

    भैया, ये था क्या? मैड मैक्स का गाजर दिखा के लोगों को बरगलाना या ग्रैण्ड मास्टर रोबो के बहाने कुछ भी रेलम-पेल पेलना? भैया क्यों IIT का नाम खराब कर रहे हो, अगर 11 बार मैड मैक्स देखने से आप moifightclub पर कुछ भी मुँहपेलाई करने योग्य हो जाते हो तो ऊपर के सारे कमेण्ट्स तो आपने पढ़ ही लिये होंगे। कॉण्टेंट का नाम ले कर नॉस्टेलजिया का साजिद ख़ान-sque रायता जो आपने बिखेरा है, उसको देख कर लगता है कि आपके दोस्त की बहनें आपको उतना ही चेप समझती होंगी जितना यहाँ अपना वक़्त ज़ाया करके हम समझ रहे हैं, रही बात कॉमिक्स की तो वो 64 पन्नों की थी, आप खामख्वाह यादों का 61-62 करने पे तुल गये हो। रही बात हिंदी में लिखने के गुरूर की तो स्पेलिंग और व्याकरण की अशुद्धियों की वजह से अब तक आँखों में दर्द है। शायद आपकी ये मैड मैक्स देखने चलने की constant pestering से परेशान आपके moifightclub वाले मित्र ने आपको यहाँ अनुग्रहित कर दिया। “ओह Wow! Dude you write in Devanagari, you talk about Raj Comics, all the cowbelt readers will be super kicked reading your rambling…” साला सण्डे खराब कर दिया।

  4. बनारसी पान says:

    और अगर आप स्टोरी टेलर हो तो मैं दीपिका पादुकोण हूँ और केआरके ऑस्कर का प्रबल दावेदार। रहने दो बेटा तुमसे ना हो पायेगा।

  5. Uss samay comics digest Rs 20 ki nahi, Rs 15 ki hoti thi. Aur saath me ek magnetic stcker bhi free milta tha…

  6. AIDS says:

    isse pad ke mujhe 2 baarr AIDS ho gaya !!!

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