Posts Tagged ‘Rajat Kapoor’

The first look of Anu Menon’s new film, Waiting, is out. Do check out the trailer.

WaitingThe film stars Naseeruddin Shah and Kalki Koechlin in the lead, and it also has Rajat Kapoor, Sushasini Maniratnam, and Arjun Mathur.

Going by official release – WAITING is a film about the special relationship between Shiv (Naseeruddin Shah) and Tara (Kalki Koechlin), who befriend each other unexpectedly in a hospital while nursing their individual spouses in coma. It is a film about grief, yes, but it is also about confronting it with optimism and learning to live with courage, love with faith and laugh with hope.

Minor grouse – the way the song is laid out in the background of the trailer, with dialogues coming on top of words (of the song), its difficult to hear either. Wish it was just music, and not words, when there are dialogues on top. One really has to strain hard to get everything

Cast & Crew

Ishka Films & Drishyam Films PRESENT

WAITING

DIRECTED BY Anu Menon

CAST: Naseeruddin Shah, Kalki Koechlin, Rajat Kapoor, Sushasini Maniratnam, Arjun Mathur

PRODUCED BY: Priti Gupta, Manish Mundra

SCREENPLAY: Anu Menon, James Ruzicka

DIALOGUE: Atika Chohan

DIRECTOR OF PHOTOGRAPHY: Neha Parti Matiyani

EDITING: Nitin Baid, Apurva Asrani

MUSIC: Mikey McCleary

SOUND: Roland Heap, Udit Duseja, Mandar Kamalapurkar

CASTING: Shubham Gaur, Gautam Pisharody

PRODUCTION DESIGNER: Prajakta Ghag

CHOREOGRAPHY: Shampa Gopikrishna

VFX: Bibek Basu

EXECUTIVE PRODUCER: Nancy Nisa Beso

ASSOCIATE PRODUCERS: Poonam Punjabi, Shiladitya Bora

CR1oEBvXIAAZJsi

11 Storytellers. 11 Perspectives. One Crazy night!
11 eclectic filmmakers come together to bring you one exciting cinematic vision.

That’s how the makers of “X” have described their film. Interestingly, it’s one-of-its-kind film because eleven Indian filmmakers with disparate styles of filmmaking have come together for this one.

So what is it about? Here’s the official synopsis

A filmmaker with a mid life crisis meets a mysterious young girl who reminds him of his first girlfriend at first, and subsequently, of every woman in his life.

Who is she? Is she real or imaginary? A stalker or a ghost? His past catching up or a character from the script he is writing?

Do check out its new trailer. The film releases on 20th November, 2015.

Cast & Crew

Cast: Aditi Chengappa, Bidita Bag, Gabriella Schmidt, Huma Qureshi, Neha Mahajan, Parno Mitra, Pia Bajpai, Pooja Ruparel, Radhika Apte, Richa Shukla, Rii Sen, Swara Bhaskar, Anshuman Jha and Rajat Kapoor

Directed by: Abhinav Shiv Tiwari, Anu Menon, Hemant Gaba, Nalan Kumarasamy, Pratim D Gupta, Q, Raja Sen, Rajshree Ojha, Sandeep Mohan, Sudhish Kamath and Suparn Verma

Written by: Abhinav Shiv Tiwari, Anu Menon, Hemant Gaba, Pratim D Gupta, Q, Raja Sen, Rajshree Ojha, Sandeep Mohan, Sudhish Kamath, Suparn Verma and Thiagarajan Kumararaja

Directors of Photography: Anuj Dhawan, Aseem Bajaj, Dinesh Krishnan, Gairik Sarkar, Katyayani Mudholkar, Maeve O Connell, Q, Ravi K Chandran, Sandeep Mohan, Siddhartha Nuni, Sidharth Kay and Viraj Sinh Gohil

Edited by: Sreekar Prasad, Vijay Prabakaran, Vijay Venkataramanan, Biplab Goswami, Gairik Sarkar, Dhritiman Das, Shreyas Beltangdy, Ankit Srivastava, Ninaad Khanolkar

Post Production Management & Grading: Siddharth Meer

Sound Mix: Dipankar Jojo Chaki

Lyrics: Pratyush Prakash & Raja Sen

Music: Sudeep Swaroop

Additional Screenplay: Thiagarajan Kumararaja

Executive Producers: Shiladitya Bora & Sudhish Kamath

Produced by: Manish Mundra/Drishyam Films

 

Like in the last few years, Rajeev Masand has done a series of roundtable discussions this year too. And the one which has the best panel and which interests us the most is the directors roundtable. This one had Vishal Bhardwaj (Haider), Rajat Kapoor (Ankhon Dekhi), Vikas Bahl (Queen), Imtiaz Ali (Highway), RajKumar Hirani (PK) and Abhishek Varman (2 States).

As we have done in the past, this year too we are trying to source the scripts of some of the best films of the year. As most of you know, the scripts of Hollywood films are easily available online, even the unreleased ones. But we don’t have any such database of Hindi or Indian films. So that has been the primary reason for this initiative. And it has been possible because some of the filmmakers have been very supportive about it. It’s only for educational purpose and much like the spirit of the blog, is a complete non-profitable exercise.

Rajat Kapoor’s Ankhon Dekhi is easily one of the best films this year. It has made it to the top of the year end list of many critics, filmmakers and our post too. Rajat has always been known for writing and directing unusual and interesting stories. But this time, the film really went beyond just the interesting premise. So here’s the script of Ankhon Dekhi in our “Best of 2014” list.

Thanks to Rajat Kapoor for sharing it. We have Ankhon Dekhi’s script in its pre-shooting original draft.

Do click on the “Scripts” tab on the top right corner of the blog page to access all the other scripts (Queen, The Lunchbox, Shahid, Kai Po Che, D Day, Lootera, Kahaani, Ek Main Aur Ek Tu, Agent Vinod, Dev D etc) that we have posted here so far.

Film – Ankhon Dekhi

Director : Rajat Kapoor

Story, Screenplay, Dialogue – Rajat Kapoor

In the last of our posts on Ankhon Dekhi (Fatema Kagalwala’s piece here and Q&A with Rajat Kapoor here), Mihir Pandya (film critic and the author of Shahar aur Cinema: Via Dilli) comes up with some keen observations on the naksha of Babuji’s home, mind-scape, and philosophy.

And continuing with our efforts to share the scripts of most talked-about and best reviewed films, we have Ankhon Dekhi’s script in its pre-shooting original draft. Thanks to Rajat Kapoor for sharing it.

 


vlcsnap-2014-04-21-16h54m50s212अाँखों देखी : विलक्षण साधारणता अौर अनुभवजन्य यथार्थ

राष्ट्रीय पाठ््यचर्या की साल 2005 में प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में बनी रूपरेखा के मध्य एक दिलचस्प किस्सा सम्मिलित है, ‘शीत ऋतु की एक सुबह’ शीर्षक से. किस्सा कुछ यूँ है, “शिक्षिका ने बच्चों को प्रात:कालीन दृश्य बनाने के लिए कहा. एक बच्चे ने अपना चित्र पूरा किया और पार्श्व को गाढ़ा कर दिया लगभग सूर्य को छिपाते हुए. “मैंने तुम्हें प्रात:कालीन दृश्य बनाने के लिए कहा था, सूर्य को चमकना चाहिए.” शिक्षिका चिल्ला उठी, उसने यह ध्यान नहीं दिया कि बच्चे की आँखें खिड़की से बाहर देख रही हैं; आज अभी तक अँधेरा था, सूर्य गहरे काले बादलों के पीछे छिपा हुआ था.” किताबी शिक्षा के ऊपर स्वयं बच्चे के अनुभवजन्य सत्य को तरजीह देनेवाले इस किस्से की याद मुझे फिल्म ‘अाँखों देखी’ देखते हुए बेतरह अाती रही.

रजत कपूर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘अाँखों देखी’ के मध्य एक सहज ध्यानाकर्षित करनेवाले प्रसंग में कथा के केन्द्रीय किरदार बाबूजी (संजय मिश्रा) अपने स्कूल में पढ़ने वाले भतीजे के उस गणित के मास्टर से सीधे भिड़ जाते हैं जिसने भतीजे द्वारा उत्तरपुस्तिका में अक्षरश: वही उत्तर न लिखा होने के चलते, जो किताब में लिखा है, उसे परीक्षा में फेल कर दिया है. इस दृश्य की खूबसूरती जितनी इसके तर्क में है, उतनी ही इसके किरदारों की ख़ब्त अौर उससे उपजते उनके विरोधाभासी व्यक्तित्वों में है. यहाँ पुरानी दिल्ली के निम्नवर्गीय परिवार का मुखिया एक मिडिल स्कूल के गणित के मास्टर को यह समझाने में लगा हुअा है कि सिर्फ़ नज़रिये का फर्क किसी सच को झूठ में नहीं बदल देता, अौर कि सच्चाई को देखने-समझने अौर महसूस करने के सबके अपने निजी तरीके-रास्ते हो सकते हैं. दोनों सामान्य से गणित के सिद्धान्त पर दूसरे अादमी को खिजा देने की हद तक पिले हुए हैं. बाबूजी का तर्क है कि जब दो समांतर रेखाएं एक-दूसरे से मिल ही नहीं सकतीं, तो यह क्यों कहा जाये कि वे किसी अनदेखे-अदृश्य ‘अनन्त’ पर जाकर वे मिल जायेंगी?

बाबूजी का भतीजे की गणित की किताब में मौजूद निर्जीव समांतर रेखाअों को नई मौलिक नज़र से देखने का यह अाग्रह जीवंत लोगों को देखने के उनके नज़रिये में भी पैठ बना रहा है. अपने ही दफ्तर के चायवाले अौर साथ काम कर रहे बाबू में उन्हें वह सुन्दरता नज़र अाने लगती है, जिसे चिह्नित करने की फ़ुरसत अौर नज़र, शायद दोनों ही उनके पास पहले नहीं थी. अौर सिर्फ़ अपने ‘भोगे हुए यथार्थ’ पर दुनिया को पहचानने के इस नए प्रण के पीछे कोई अाख्यानिक किस्म का किस्सा भी नहीं है. यूँ ही एक भले दिन घर में घटी सामान्य सी घटना से बाबूजी को यह भिन्न क़िस्म का नज़रिया हासिल होता है अौर फिर घर में एक नितान्त रोज़ाना सी सुबह बाबूजी दफ़्तर जाने से पहले नहाते हुए यह प्रण करते हैं कि “मेरा सच मेरे अनुभव का सच होगा. अाज से मैं हर उस बात को मानने से इनकार कर दूंगा जिसे मैंने खुद देखा या सुना न हो. हर बात में सवाल करूँगा. हर चीज़ को दोबारा देखूँगा, सुनूँगा, जानूँगा, अपनी नज़र के तराजू से तौलूँगा. अौर कोई भी ऐसी बात, जिसको मैंने जिया ना हो उसको अपने मुँह से नहीं निकालूँगा. जो कुछ भी गलत मुझे सिखाया गया है, या गलत तरीके से सिखाया गया है वो सब भुला दूँगा. अब सब कुछ नया होगा. नए सिरे से होगा. सच्चा होगा, अच्छा होगा, सब कुछ नया होगा. जो देखूँगा, उस पर ही विश्वास करूँगा.”

यहाँ यह भी साथ ही रेखांकित किया जाना चाहिए कि बाबूजी को अचानक हासिल हुई दुनिया को देखने की यह अनुभवजन्य यथार्थ पर अाधारित दृष्टि उन्हें परिवार के अन्य किरदारों से भिन्न तो बनाती है, लेकिन वे फिल्म के ‘अादर्श नायक’ नहीं हैं. फिल्म इस बात को लेकर सदा चेतस है कि बाबूजी अपनी नई दृष्टि से लैस होकर भी परिवार के मुखिया की उस भूमिका को नहीं छोड़ते जहाँ घर के अन्य सदस्य उनकी नज़र में स्वयं कर्ता नहीं, उनकी क्रियाअों पर प्रतिक्रिया करनेवालों की द्वितीयक भूमिका में हैं. छोटे भाई के घर छोड़कर चले जाने के प्रसंग में भी उनका अनुभवजन्य यथार्थ उन्हें अपने भाई के निजी यथार्थ तक नहीं पहुँचने देता. अौर ख़ासकर यह उनके अपनी पत्नी (सीमा पाह्वा) से संबंधों में प्रगट होता है. बाबूजी अपनी नई दृष्टि से लैस होकर भी घर के भीतर उस नई दृष्टि का इस्तेमाल कर पाने में असमर्थ हैं अौर अपनी पत्नी को कहते हैं, “कुछ भी नया सोचो अौर तुम अौरतें… चुप रहो.” लेकिन फिर अपनी बेटी से संबंध में यह नई दृष्टि बाबूजी को नई पीढ़ी के अनुभव तक पहुँचने में मदद भी करती है. वे देख पाते हैं बिना किसी पूर्वाग्रह के, जो उनकी बेटी अपने भविष्य के लिए निर्धारित कर रही है.

बाबूजी अजीब किस्म की लगती ख़ब्त तो पालते हैं, लेकिन वे इसके ज़रिये कोई क्रान्ति करने निकले मसीहाई अवतार नहीं हैं. दरअसल इसके ज़रिये वे अपनी साधारण सी लगती ज़िन्दगी को ही कुछ अौर बेहतर तरीके से जानने, समझने की कोशिश कर रहे हैं. यहाँ यह फिल्म शशांत शाह की ‘दसविदानिया’ की याद दिलाती है, जिसमें मध्यवर्गीय ज़िन्दगी की साधारणता अौर उस साधारणता में छिपी विलक्षणता की कथा कही गई थी. यहाँ दरियागंज में पुश्तैनी मकान में रहनेवाले संयुक्त परिवार की ज़िन्दगी का टुकड़ा हमारे सामने है, जिसके चिह्न फिल्म के प्रामाणिक सेट डिज़ाइन, संगीत अौर धारधार छायांकन में उभरकर सामने अाते हैं. अौर उन संदर्भों के ज़रिये जिनसे फिल्म पुरानी दिल्ली की निम्न मध्यमवर्गीय ज़िन्दगी अौर उसमें होते पीढ़ीगत बदलाव को रचती है. घरों का बदलना अौर उनमें मुखियाअों की सत्ताअों का बदलना यहाँ स्टील के गिलास से चीनी-मिट्टी के कपों में होती गरम चाय की यात्रा में अभिव्यक्त होता है. यहाँ बन्द घरों अौर अापस में जुड़ी हुई छतों वाले घरों में इन्हीं शामिल छतों पर मनाए जाते सार्वजनिक जन्मदिन हैं तो मोहल्ले के नाई की दुकान अाज भी पुरुष ज़िन्दगी का सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थान है. लेकिन फ़िल्म का सबसे चमत्कारिक पदबंध उस घर की संरचना में छिपा है, जिसमें यह संयुक्त परिवार इतने सालों से रहता अाया है.

मेरे लिए ‘अाँखों देखी’ की बहुत सारी प्रामाणिकता उस घर के नक्शे में छिपी है, जिसमें बाबूजी अौर उनका परिवार इकट्ठे रहता है. बीच में बड़े से चौक के चारों अोर बने रेलगाड़ी के अागे-पीछे लगे डिब्बों से छोटे-छोटे कमरों से घिरी इस बहुमंज़िला इमारत को मैं देखते ही पहचान जाता हूँ. चूने की बनी दो हाथ चौड़ी मोटी दीवारों अौर खड़ी सीढ़ियों से बनी यह इमारतें उत्तर भारतीय शहरों की भवन निर्माण कला का शायद एक समय में सबसे प्रामाणिक नक्शा रही हैं. इनका बड़ा पोलनुमा दरवाज़ा किसी घनी इंसानी बस्ती की संकरी सी गली में खुलता है अौर कमरों के भीतर कमरे निकलते चले जाते हैं. अाप इस इमारत के नक्शे का मिलान अागरा शहर में रहनेवाले मिर्ज़ा परिवार की उस पुश्तैनी हवेली से कर सकते हैं, जिसे हमने सथ्यू साहिब की ‘गरम हवा’ में देखा था. अौर साथ ही इस तुलना द्वारा यहाँ समय के साथ उपयोग में बदलाव के चलते इन पुश्तैनी मकानों की बदलती संरचना पर भी गौर किया जाना चाहिए. समय के साथ जैसे-जैसे शहरी जीवन की सामुदायिकता सीमित हुई, घरों की संरचना में चौक का केन्द्रीय महत्व भी सीमित होता गया. भागती ज़िन्दगी के निवासी इन नौकरीपेशा लोगों की ज़िन्दगियों में समय को लेकर वो सहूलियत नहीं थी कि वे चौक में मजमा लगाकर घंटों चौपाल किया करें. नतीजा, चौक की जगह के अन्य उपयोग ढूँढ़े जाने लगे.

लेकिन इन इमारतों का नक्शा कुछ इस शक्ल का था कि चौक पर सीधे-सीधे छत डाल देना भी संभव नहीं था. यह चौक दरअसल बाक़ी मकान के लिए उस कृत्रिम फेंफड़े की तरह था, जिससे होकर ताज़ा हवा अौर रौशनी बाक़ी सारे निर्मित मकान में अाया करती थी. अौर मकान की संरचना में यह इन्तज़ाम ज़रूरी भी था, अाखिर अापस में एक-दूसरे से छतों से जुड़े मकानों वाले इन रिहाइशी इलाकों में वैसे भी अौर घर में रौशनी अाती भी कहाँ से. घर के नक्शे में हवा अौर रौशनी का इन्तज़ाम घर के बीच से ही करना ज़रूरी होता था. अौर ऐसे में अगर इस चौक के ऊपर पक्की छत पड़ जाती तो बाक़ी सारे मकान की हवा-रौशनी बन्द हो जाती. यहाँ फिर वो जुगत काम में अाती है जिसे इन पुश्तैनी मकानों में रहनेवाली नई पीढ़ियों ने इन घरों को हमेशा के लिए छोड़ने से पहले के कुछ सालों में बहुतायत से अपनाया अौर जिसका गवाह मेरा बचपन भी रहा है.

‘अाँखों देखी’ उस परिवार के बारे में है जिसके सदस्यों के मन में नए समय के साथ दौड़ लगाने की तमन्ना तो है, लेकिन उसके पाँव में सीमित अाय की बेड़ी पड़ी है. वह इस पुश्तैनी मकान की संरचना को बदलना चाहता है, उससे बाहर निकलना चाहता है. लेकिन उसके अार्थिक संसाधन उसे ऐसा करने की इजाज़त नहीं देते. अौर इस कारण वह इसी घर को नए समय में अनुकूलित करता है. इसीिलए चौक के ऊपर पड़ी उस जाली को मैं तुरन्त पहचान जाता हूँ. लोहे के सींखचों वाली यह जाली चौक के ऊपरी हिस्से को कुछ इस तरह ढकती है कि रौशनी अौर हवा पूरी तरह बन्द भी न हों अौर ऊपरी मंज़िल (जो ऐसे मकानों में सदा ज़्यादा ‘ख़ास’ होती है) को घर के बीच एक नया फर्श भी मिल जाये. फर्श न नही, फर्श का अाभास ही सही. ‘अाँखों देखी’ में परिवार के रिहाइश के मकान के मध्य में पड़ी यह जाली कितना कुछ कहती है. यह बताती है कि इस मकान में रहनेवाले अब इस रिहाइश के अनुकूल नहीं रहे अौर किन्हीं मजबूरियों के चलते अब अपने मकान को खुद की ज़रूरतों के अनुसार अनुकूलित कर रहे हैं. यह भी कि एक न एक दिन वे यहाँ से निकल जायेंगे. इसीलिए शायद छोटे भाई ऋषि (रजत कपूर) के पुश्तैनी घर छोड़कर जाने पर फिल्म का जो दृश्य सबसे ज़्यादा याद रह जाता है वो है उसी जाली को बीच से खोलकर रस्सियों द्वारा उतरती अलमारी का दृश्य.

कुछ साल पहले ‘लाइफ स्टाइल’ का कहलाए जानेवाले एक टीवी चैनल पर परिचर्चा में निर्देशक अौर अभिनेता रजत कपूर अपनी निजी ज़िन्दगी के बारे में बड़ी दिलचस्प बात बता रहे थे. ऐसे समय में जब मोबाइल भारतीय मध्यवर्ग की ज़िन्दगियों का ही नहीं, शहरी निम्नवर्ग की जीवनचर्या का भी अभिन्न हिस्सा हो गया है, वे अपने साथ मोबाइल नहीं रखते. वजह पूछने पर उन्होंने बताया था कि उनके हिसाब से इतना महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं कि ज़रा देर इन्तज़ार न कर सके. बात को कुछ अौर लम्बा खीचूँ तो मतलब यह कि दुनिया में अाप जिस वक्त जहाँ मौजूद हैं, उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण कहीं कुछ अौर नहीं घट रहा, यह विश्वास इस निर्णय के पीछे है. गौर से देखिए तो उनके द्वारा निर्देशित फिल्म ‘अाँखों देखी’ के मुख्य किरदार में भी अचानक यही विश्वास पैदा हो जाता है. वह अपने वर्तमान को किसी अन्य अदृश्य यथार्थ के लिए ठुकराने से इनकार कर देता है.

फिल्म में बाबूजी का यह निर्णय उनको अपने निजी यथार्थ में कहाँ पहुँचाता है, यह तो अाप फिल्म देखकर ही जानें. लेकिन फिल्म में बाबूजी की इस ख़ब्त से उपजे दो बहुत दिलचस्प प्रसंग हैं, जिनका उल्लेख मैं यहाँ करना चाहूँगा. पहला प्रसंग उनके फैसले के दिन का ही है, जब बाबूजी अपने भाई के अखबार पढ़ने पर टिप्पणी करते हैं, “खबर नहीं है ये. सब बकवास है. खबर वो होती है जिसे हम अपनी अाँखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं.” अौर दूसरा प्रसंग उनके पड़ोसी के लड़के द्वारा यह टिप्पणी किए जाने पर कि “बाबूजी भी न, कुएँ के मेंढक जैसी बातें करते हैं.” उनका जवाब बहुत मानीखेज़ है, “हाँ, मैं मेंढक हूँ. लेकिन अपने कुएँ से मैं परिचित हूँ. उसको जानने की कोशिश कर रहा हूँ. उससे अपना परिचय बढ़ा रहा हूँ.” अौर इसमें वह प्रसंग भी जोड़ लें जहाँ बाबूजी चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन के बाहर व्यस्त सड़क पर हाथ में तख़्ती लिए खड़े हो जाते हैं. तख़्ती पर लिखा है, “सब कुछ यहीं है, अाँखें खोल कर देखो.” मेरी दिलचस्पी इन दोनों संदर्भों को जोड़कर देखने की है. क्या हम सूचना विस्फोट के इस महासमय में अपने निजी अनुभवजन्य यथार्थ से अपनी पकड़ खो रहे हैं? मैं यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि इन अाधुनिक सूचना के साधनों पर हमारी निर्भरता कहीं न कहीं हमें द्वितीयक स्रोत पर प्राथमिक अनुभव से ज़्यादा भरोसा करनेवाला बनाती है. तर्क भी इसका साथ देता है क्योंकि एक अकेले व्यक्ति के अनुभव के मुकाबले समूह का अनुभवजन्य सत्य या तकनीक अाधारित सामुहिक यथार्थ बड़ा माना ही जाना चाहिए. लेकिन इसके अपने खतरे हैं, जिनका सामना हम वर्तमान समय में कर रहे हैं. अाज द्वितीयक सूचना के स्रोतों को योजना के तहत नियंत्रित किया जा रहा है. शायद मध्यवर्गीय जनसमूह इसे पहचान भी रहा है. लेकिन दिक्कत यहाँ अाती है कि उसने अपने प्राथमिक स्रोत, अपने अनुभवजन्य यथार्थ में भरोसा खो दिया है. ऐसे में हम सब जैसे किसी अंधेरे तहख़ाने में हैं अौर एक-दूसरे से भविष्य का हाल ऐसे ले रहे हैं जैसे कोई अंधा हाथों से टटोलकर कमरे में रखे हाथी की अाकृति को पहचानने की कोशिश कर रहा हो. पिछले एक महीने में दर्जनभर लोग मुझसे बहुत उम्मीद से यह पूछ चुके हैं कि मैं उन्हें बताऊँ कि अाने वाली सोलह मई को अाखिर होने क्या वाला है.

मेरी खुद को भी, अौर उन तमाम लोगों को भी जो किसी छिपे हुए यथार्थ को जान लेने की तलाश में अाजकल बनारस की अोर भाग रहे हैं, एक ही सलाह है − “सब कुछ यहीं है, अाँखें खोल कर देखो”.

– Mihir Pandya

(This piece was first published in Hindi journal ‘Kathadesh’)

And here’s the script of Ankhon Dekhi


We generally don’t have a culture of discussing movies with the makers after they are made. Most of the talk on the film happens before its release, mostly as a PR exercise. But things are changing slowly/steadily and after similar discussions on Gangs of Wasseypur, Rockstar, Paan Singh Tomar, and recently Highway, we got a chance to interact with Rajat Kapoor on his excellently reviewed ‘Ankhon Dekhi’.

Here’s the video in 3 parts, and advance apologies for low sound on the questions (keep your speakers at full-blast please). Though Rajat Kapoor’s responses are loud and clear enough. The session was moderated by our own Somen Mishra and film’s music director Sagar Desai, lyricist Varun Grover, and actor Taranjit Kaur (who played Rajat’s wife in the film) were also present on/around the dais.

(A quick thanks to Cinemax Versova managers and our PVR-man Shiladitya Bora for the venue permissions and arrangements, and Sameer Sheikh for getting the video recorded and uploaded..)

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Rajat Kapoor’s new film Ankhon Dekhi opened with rave reviews. Though it has been a limited release, if you still haven’t seen it, do watch. It’s easily one of the finest films of the year. And if you have seen it, here’s Fatema Kagalawala on what worked and what didn’t. Read on to see if you agree or not.

“Rather than love, than money, than fame, give me truth.” ― Henry David Thoreau, Walden

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Are stories set in a real-life world created with an unimaginable honesty, enough? Remember this line as you read along.

There are films that are character-centric, there are films that are character-driven, there are plot-driven films and there are those where the idea looms large enough to swipe everything under its shadow. Ankhon Dekhi is one of those films. Truth is your inner truth, your own truth, what you can see and feel and experience. Can a theme get more universal and personal at the same time than that? Can a theme get more exciting, thirsting to be explored threadbare than that?

“There are only two days that are important in life; the day you were born and the day you realise why.” – Mark Twain

Bauji has an eiphany one day and he must follow it because suddenly he has realised why he was born. He must follow his own truth and his own truth will only be that which he has experienced. Soon, the meaning of his entire life changes. He leaves his job as a travel agent because he hasn’t seen any of the places he regularly recommends and hence it is a false existence, something he cannot allow in his life anymore. “Rather than love, than money, than fame, give me truth”, Bauji could easily have been Thoreau. Or Maya Angelou who when asked what is right simply said, “Truth is.” His loving wife and daughter indulge him, his younger brother, tired of hauling material responsibilities leaves him, his loyal fans follow him blindly and we have a picture of life as we all have seen unfolding in our own worlds.

Creating a world to touch and feel

Every film is rooted in its own ideology and born of it, whether it likes it or not, whether it is conscious of it or not. Rajat Kapoor’s cinema seeks to question consciously and that is the joy of watching his films. In Mixed Doubles he questioned the idea of monogamous relationships, in Mithya and Fatso identity and truth, in Ankhon Dekhi truth again. There is something very honest, at an intrinsic level, in his searching and nudging set beliefs. That draws you in and makes you take it seriously, keen to know if the journeys of his characters will somehow make your own easier and enlightened.

It does but not in the philosophical proddings. It does in the earthy, rustic (and inspired) casting of Sanjay Mishra, Seema Pahwa and others. It does in the lovely, early morning winter mist-like songs written by Varun Grover used beautifully. It does in the very common-sounding but carefully written dialogues. It does in the loving relationships we see functioning in what we see as a very average, very ordinary family. We smile when we see Seema Pahwa’s Amma, nagging but warm and soft-hearted wife and mother because we know her, maybe in our own mothers, wives, mother-in-laws, aunts, grandmothers or neighbours. Even if we don’t she seems familiar. Because she is real.  There is no artifice in her character or her performance and she appeals to us in a way no hot babe or heartthrob can aspire to. Like most women do, she forms the spine of the family, keeping it together emotionally yet invisibly. (If you disagree, imagine the family without Bauji. Then imagine the family without her). Getting her character right (and getting the brilliant Seema Pahwa to play it) is the first solid brick Rajat Kapoor lays in creating a world we cannot help but fall in love with.

As we gently land into the world we are welcomed by a ruckus over the inappropriateness of the friendship the daughter of the house has with a boy. Bauji protects her as Amma lashes at her. We then see Bauji’s younger brother Rishi (a terribly miscast Rajat Kapoor) step in to play the peace-making voice of sense role with a sigh; a role he has probably been playing for a long time now and is weary of. There is also the no-good younger son (a character that spirals the story even more out of focus in the second half) whom Bauji doesn’t know what to do with and we see that the irregularities of the family are as regular and middle-class as they can get. There is daily bickering, daily endearing moments, gentle warmth and regular disappointments as ordinary yet interesting for it, as the patchwork quilt the family cosily shrouds themselves in, in the cold nights of this North Indian town.

“The truth is out there!”

Bauji would like to believe so but there is a strong corollary to that. Only that truth is truth that is true to your experience. And hence begins a journey of a family dragged into this search of truth by the man of the house who now begins to appear a little senile to our eyes shrouded by practical concerns. We, as an audience become the family and Bauji the lone crusader trying to put out what he has discovered.

I tripped out on the promise of the premise completely.

“In a time of deceit telling the truth is a revolutionary act.” ― George Orwell

Truth does revolutionise Bauji’s life. The search for truth comes with a price, from Gandhi to Satyapriya, they all knew it. The price Bauji pays is to see his joint family breaking up. Rishi chooses to live separately with his family and the graceful Bauji lets him be. We sense there is a parallel search for one’s own truth unfolding elsewhere. Practical and material concerns do not provide us the middle-class luxury to indulge in fancy philosophical journeys; no, that’s for the elite. And hence the entire family rises up in arms against Bauji’s new avatar. Philosophy is costly but we forget that in merely surviving we let go of living. Subtly deceiving ourselves that this is what life is meant to be after all. For Bauji, surviving suddenly becomes an ugly word.

Sadly, his discovery does not become an expansive, life-affirming philosophical journey or a guiding light. Neither does it elevate itself to a deep, cinematic exploration of its theme. Like Matrix did for example.

Instead, we have a situation with little sub-text to the real theme, of his younger brother’s separation from the joint family. Animosity grows between the brothers, one that is treated gently and with love but does it contribute anything to the central conceit of the film? Yes, the younger brother is following his own truth but the film seems to be saying little about his journey, treating it with realist-humanist sympathy alone with no philosophical implications. A mere by-product of the mess Bauji has invited in his life by choosing what he has. That a sub-plot that crucial has little bearing to the theme than being a mere outcome seemed to me to be disservice to everyone included.

“Men occasionally stumble over the truth, but most of them pick themselves up and hurry off as if nothing ever happened.” ― Winston Churchill

The tender-hearted Bauji suddenly becomes a braveheart in our eyes because he finds in himself the courage to face the truth he has found. It isn’t easy, such conviction, but neither is it difficult because when you have an epiphany, when the clouds clear for that insoluble moment of time and the sun shines brighter than it ever has, all shadows fall away, and the truth stands alone, refusing to be blind-sided, refusing to be hidden by rationalisations yet again. With such truth such courage comes as default. One has no other way. Yet, Bauji’s truth does not become ours nor egg us to seek ours. It gets lost in the whimsy of card-playing popularity, fan-following herds, and placard-holding eccentricities. None of which are organic or dynamic. They remain interesting plot points, the ‘coulds’ one writes on the margins of a script when at crossroads of plot development.

It’s almost like Rajat Kapoor himself stumbled over the truth, picked himself up and hurried off as if nothing happened.

And that killed the film for me. A theme as rich as that I found aimlessly tossed around, especially one with a very honest intent and one that is completely devoid of posturing. I know what became of Bauji but was it an organic growth or a cop-out? To me it seemed like the latter. Not that I know, but the alleys of truth must be convoluting, without easy answers, especially since so many of us know so little about it. The end of Bauji’s search seemed very easy. And his journey very unmindful as well. For a man who has found the reason of his existence, one which has been turned 360 degrees, he seemed to be acting more from whim than a focussed intent. Because whim is superficial but intent helps you delve deeper. If Bauji’s character had truly delved deeper he wouldn’t be going on trips to the zoo very late in the second half to establish a point he had painstakingly established very early on. If his character hadn’t taken an eccentric turn he wouldn’t suddenly become the lucky charm of a small-time Mafioso. His character seemed to be truly seeking and struggling, breaking free and revolutionising all that we know of an average man’s search for truth (notice the paradox in the statement) when he took to standing on the chowk holding confounding placards embarrassing his family. But suddenly, there was no movement in this journey. And a brilliant plot point became a mere set piece contributing nothing to anything.

 “The more I see, the less I know for sure.” ― John Lennon

Is this why Bauji ends up the way he does? We don’t know, however we are led to believe that he has come to a fructifying end to his journey. With the end as he chooses for Bauji, Rajat Kapoor seems to want to put an existential spin in the narrative which is as exciting a thought as his original theme. But there are no questions raised before we are led to this resolution. Nor is there an indication of a journey that seeks a proper close. The end comes and goes, just like Bauji’s epiphany, leaving us cold when it should have ideally left us shivering with goose bumps. Maybe inches closer to our own spiritual or intellectual thirst. That is because we did not see enough. Deep enough. Of Bauji and his thirst, his angst of marrying his new reality with his old, or a trajectory that led to his resolution that seemed to satisfy him. The film is linear and not episodic, however treating his journey as episodic fails the entire structure of the film and the audience, who by the middle are expecting more. Not answers, no one has them nor they can give anyone (Your truth is your own, remember?). Nor was it the intent of the film to provide ready ones. It was the experience of the search, the pain, angst, growth, questions, answers, trials and peace. Logically, all of this exists in the film but tattered and scattered, making little sense, not feeding off each other as it should and hence coming across as an under-played game of TT where no one wins.

Aldous Huxley once wrote, “Experience isn’t what happens to a man, it’s what a man does with what happens to him.”

I think that just about sums up, at many levels, what I feel about the film.

– Fatema Kagalwala