Posts Tagged ‘Imtiaz Ali’

We had announced about the Tamasha Post Screening Q an A with Imtiaz Ali here. Thanks to our friends at FilterCopy, the entire Q and A is online now. Apologies for the bad sound as we had to do the session in open area this time. Use headphones or speakers.

Like always, Imtiaz was quite candid about his thoughts and our criticism about the film. Also, the high point was a bunch of us saying “Hiiii” to A R Rahman on Imtiaz’s phone.

Tamasha

तमाशा देखकर निकला तो उलझन में डूबा रहा | इम्तियाज़ की फ़िल्में पसंद आती रहीं हैं,तो इस बार ऐसा क्या हुआ कि बाहर निकल कर उत्साह की जगह निराशा थी | जहाँ सब तमाशा की तारीफ़ में डूबे थे,किसको और कैसे बताऊँ कि फ़िल्म मुझे अच्छी नहीं लगी | यह जैसे ख़ुद में अपराध-बोध जैसा था | फिर सिलसिलेवार सोचना शुरू किया तो पाया कि फ़िल्म कई बातें सिर्फ़ ऊपर-ऊपर से करती है और निकल आती है |

या तो यह इम्तियाज़ की ज़िद है कि मैं कहानी दोहराऊँगा और उसे कुछ अलग रँग देकर पेश करूँगा और साबित करूँगा कि एक ही कहानी अलग-अलग तरह से दिखाने पर भी वह सफल फ़िल्म हो सकती है | इस की भूमिका वे फ़िल्म के शुरूआती बीस मिनट में बाँधते हैं | यह जैसे फ़िल्म शुरू होने से पहले उनका उद्घोष है कि दुनिया में सारी कहानियाँ एक ही तो हैं,तब फिर मुझपर यह इल्ज़ाम क्यों ? यहीं वे अपनी कहानी के लिए एक बचाव ढूँढते नज़र आते हैं | यही बात वे शुरू से अपनी हर फ़िल्म में कह रहे हैं | “इक्को एक कहाणी बस बदले ज़माना ” |

उनकी नायिका हमेशा की तरह एक बोल्ड और सामाजिक ताने-बाने के ऊपर की एक लड़की है जिसे बकौल इम्तियाज़ “हुस्न की गलियाँ ” दिखें या ना दिखें से कोई दिक्कत नहीं | वह दुनिया घूमती है,अपने फ़ैसले लेती है और इस विचार से कि दोबारा शायद नायक से मुलाक़ात ना हो,ऐसे में अपने दिल की सुनने से नहीं चूकती और देह की बनी-बनाई परम्पराओं को लाँघने के बाद आज़ाद महसूस करती है | फिर प्रेम उसको कमज़ोर बनाता है और अंत तक आते आते वह इस बात से संतुष्ट है कि वह एक सफल पुरुष की प्रेयसी या पत्नी है |

कहानी मूल रूप से नायक के भटकाव और एक लड़की के प्रेम से गुज़रते हुए खुद को पा लेने की है और यहीं फ़िल्म सबसे कमज़ोर है | हाँ यह सही है कि प्रेम हमारे अंतर्मन को छूता है और कई सारे बदलाव करता है | कोई हमें इस तरह पहचानने लगता है जिस तरह कभी किसी और ने नहीं पहचाना हो | प्रेम भीतर घुस कर हमें उधेड़ता है और हमारा असली रूप हमारे सामने ले आता है जिसे हम ख़ुद सालों से नकार रहे होते हैं | यह हम सहज स्वीकार नहीं कर पाते और ऐसे में वह इंसान जो यह सब कर रहा होता है,उसे भी हम उतना ही दोषी मानते हैं जितना ख़ुद को | जिस तरह हम अपने दुश्मन रहे होते हैं,उसी तरह वह इंसान हमारा इतना अपना हो जाता है कि अपना दुश्मन लगता है |

हम जो करना चाहते हैं,जब वो नहीं कर पा रहे होते,तो क्या हमारा बर्ताव वैसा होता है जैसा फ़िल्म के नायक का था ! उसके लिए फ़िल्म कोई विश्वसनीयता नहीं पैदा करती | वेद के अपने बॉस के साथ के सीन्स,यदि कोई फूहड़ फ़िल्म होती तो मैं हजम कर लेता,लेकिन यह इम्तियाज़ की फ़िल्म है और यहाँ वह अपनी पकड़ खोती है | वेद की छटपटाहट अपने सपने को ना जी पाने की है या तारा के प्यार के लिए है,यह भी साफ़ नहीं है |

वेद और तारा मिलते हैं और उसके बाद के तीन-चार साल तारा के कैसे बीते यह तो हमें पता है लेकिन वेद ? वह एक नौकरी में है और तारा से प्रेम में है या नहीं,यह कहाँ दिखता है | तारा के मना कर देने के बाद की जो चोट है,वह प्रेम में ठुकराए जाने की है या उस ज़िन्दगी को ना जी पाने की जिसकी झलक हमने कोर्सिका में देखी थी |

आप दिखाते हैं कि वेद ने आख़िरकार अपने मन की सुनी और फ़ैसला लिया और फिर सब ठीक हो गया | ऐसा कहाँ होता है जी | वह तो शुरुआत भर है | जीवन तो उसके बाद शुरू होता है | फ़िल्म ना तो वेद के बचपन पर ठहरती है जहाँ से उसके संघर्ष की जड़ें पकड़ में आती और ना ही अपने मन-मुताबिक ना जी पाने की स्थिति से उपजे रोज़ के संघर्ष पर |

“जब हम प्यार में होते हैं तो कितना हिस्सा असली होता है और कितना सिर्फ़ हमारे दिमाग़ में,हमारी कल्पनाओं में | जब सब ख़त्म हो जाता है तो सिर्फ़ कल्पना बचती है जो धीरे-धीरे दिमाग़ को खाती है और इस ज़्यादा सोचते रहने से ही उपजता है दुःख | प्रेम यदि एक यात्रा है तो दोनों की,एक की नहीं | हमारा नायक एक ऐसा आदमी है जो अपने बारे में सब जानता है और फिर खुद अपने हाथ से निकल जाता है |उसको पता है कि अब तक उसने खुद को संभाला है और अब उसकी लगने वाली है | वह जानता है कि वह अपने हाथों से फिसल कर सब कुछ तोड़ देने वाला है और इस बर्बादी के बाद जो सामने आएगा वह असली होगा जबकि वह जीवन भर इसी टूटन से बचता-भागता फिरता रहा | आख़िर में आप उम्मीद लगाते हैं कि अब कुछ होगा और वेद अपने परिवार वालों को एक कहानी सुनाता है और जो दिक्कत सालों से नहीं सुलट रही थी,वो यूँ हो जाता है मानो इतना ही आसान था | “

कुछ बातें जो कचोटती रहीं …

-वेद ने तो तारा के सहारे ख़ुद को खोज लिया, तारा को कौन खोजेगा ?

-जब तारा और वेद दोनों ख़ुद को खोजेंगे, तब वे अलग हो जाएँगे |

-स्त्रियाँ कब तक पुरुषों की मरम्मत के लिए उपलब्ध रहेंगी | क्या हमारी फ़िल्में उनको भी भटकाव में जीने की आज़ादी देंगी |

-क्या यह ऐसा नहीं था कि हाँ तुम अपने सपने जीयो,तुम्हारे लिए तो मैं हूँ | मेरा सपना तो तुम हो |

-क्या मन की सुनकर फ़ैसला भर ले लेना सफलता का पैमाना है | यहाँ तो कितने हैं जी जो मन की सुनकर ठोकरें खा रहे हैं और लगातार मेहनत कर रहे हैं |

-क्या ऐसी स्थिति जैसी वेद की है,वह यह हक देती है कि आप आसानी से बदतमीज़ी करें | या तो फ़िल्म इसे विश्वसनीय बनाती |

यह सारी बातें सिर्फ़ इसलिए क्योंकि फ़िल्म इम्तियाज़ की है | मुझे इरशाद कामिल के गीतों की फिर तारीफ़ करनी चाहिए और दीपिका के अभिनय की भी | अभिनय की कई परतों को रणबीर बस सतह से निभा ले गए |

तमाशा एक अच्छी फ़िल्म है,कालजयी या जादुई नहीं |

– Pradeep Awasthi

Tamasha : Post-Screening Q & A With Imtiaz Ali

Posted: November 29, 2015 by moifightclub in bollywood, News, Q & A
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Imtiaz Ali

Imtiaz Ali is one of those rare directors who is not afraid to take questions post-release. And we have always been very happy to take the initiative and make it happen. Thanks to Anurag Kashyap, what started it with Imtiaz’s Rockstar, we have managed to do with many other films. And directors have been very co-operative about it. Now, we are back to another new film by Imtiaz Ali, Tamasha. Going by reviews, FB posts and tweets, seems like this film has polarised people. That’s always interesting for a film.

Navjot Gulati has taken the initiative to get Imtiaz Ali for Tamasha post-screening Q and A. Here are the details –

Venue – PVR Icon, Infinity Mall (which was Cinemax Versova earlier)

Day/Date – Monday (30th November, 2015)

Time – After the 6pm show.

So do book your tickets, and wait after the film is over. For those of you who have already seen the film, or for some reason you can’t come for the screening but want to attend only the Q and A, do tweet to Navjot at the earliest and inform him. He is making the list and will get you in.

Come, we will have fun!

Like in the last few years, Rajeev Masand has done a series of roundtable discussions this year too. And the one which has the best panel and which interests us the most is the directors roundtable. This one had Vishal Bhardwaj (Haider), Rajat Kapoor (Ankhon Dekhi), Vikas Bahl (Queen), Imtiaz Ali (Highway), RajKumar Hirani (PK) and Abhishek Varman (2 States).

SHOWTIMES

HumaraMovie’s short-film anthology Shuruaat Ka Interval is now playing in select cinemas in Mumbai, Delhi, Pune, Bangalore and Ahmedabad (see showtimes above). What’s more- there is also an Audience Choice Award for the favorite film of the viewers.

The winner of the Shuruaat Ka Interval festival 2014 will be chosen directly by the audience. After watching the films, you can either vote in the cinemas (you will be handed ballots for the same) or vote right here. The winner will be given a cash prize of 1 Lakh and this will be announced after the films complete their run at the cinemas. So do watch and vote for your favorites below:

 

 

Shuruaat Ka Interval

PVR Director’s Rare & HumaraMovie are presenting the short film festival/anthology Shuruaat Ka Interval, which includes 8 shorts from various filmmakers, chosen and mentored by filmmakers Imtiaz Ali, Vikramaditya Motwane, Anand Gandhi & Vikas Bahl. Shortlisted candidates had access to script consultants- Bijesh Jayarajan (Yudh), Ritesh Shah (Kahaani, D Day, City Lights), Rajashree ‘urf’ Raju and Kshiti Nijhawan Agrawal. They also had access to Mukesh Chhabra and his team for casting.

All the films are based on one theme: ‘Interval’, which has been interpreted in a different, unique way by each filmmaker. Watch the trailer and read the synopsis of each short film below:

SYNOPSES of the Short Films:

1. August by Shishir Jha: Good and Evil, Yin and Yang… The continuous dichotomy of life. The path is not always a choice. A subtle interpretation of this paradox. Does the butcher only kill?

2. The Last Audition by Krishan Hooda: Anand Kumar is a struggling actor consumed by the struggle. The attempt to land a role, and the effects of the audition take over his life. He live, breathes, sleeps this process. In this obsessed role, does Anand land himself the ticket to stardom? Or does this obsession lead to his ruin? A dark tale of one’s life when you cannot differentiate life and camera!

3. No Exit by Ankit Tripathi: Is life a burden? Is memory the only thing which binds us together? Is that the reason for our misery? Cycle of life and death- is there an exit option?

4. Ayan by Amrit Raj Gupta: In the best traditions of farce- what happens when your main character disappears during the interval of a play. Do you rework the play? Can you rework the play? How do the other characters react? A laugh fest when the characters of Ramayan become real backstage.

5. Interval 3D by Palash Vaswani: What happens when a character from a Ramsay Brothers-style B Grade horror flick meets the audience? Shock, awe, funny- a ridiculous scenario from which you can only laugh your way out!

6. Bubbles and Stars by Rukhshana Tabassum: If the characters of a play were to indulge in their reverie, would their interactions be meaningful? Shot completely in black & white, a beautiful tale which reminds you of films of the silent era and what actually makes us love films

7. Final Interval by Aarti Bagdi: This is the story of a housewife, a mother, a mother-in-law, a grandmother, a superwoman. She binds the extended family together. And she needs a break!

8. Gatekeeper by Atanu Mukherjee: Gatekeeper revolves around the life of a man who guards a railway crossing. His only source of excitement in life is watching the trains passing by. Is there something which intrudes in this monotony? Or can this monotony be enjoyable?

Shuruaat Ka Interval releases in select cinemas in Mumbai, Delhi, Bangalore and Pune on 15 August, 2014.

Today morning, we were discussing reviews versus blogs. It started with a personal and candid post (Dad, We’re In Nebraska) by Rahul Desai. If you have seen Nebraska, do read it. It’s a strange feeling when you can identify your life with a film. And sometimes, it’s liberating in more ways than one. Today evening, we received another personal piece by @kuhukuro. This one is about Highway. An honest, brave, and candid open letter to the filmmaker whose film had an impact on her as it mirrors her life. Do read.

 Alia-Bhatt-and-Imtiaz-Ali-on-location-shooting-for-Highway-in-Punjab28.03.2013

Dear Imtiaz,

I am not a film critic, nor can I boast of being very cinema-savvy. But I have been insane enough to source my philosophies from cinematic moments. Films have been thriving territories for epiphanies. Highway comes at a point in my life when I am delving in the art of being ruthlessly honest to my feelings, of asserting myself, and of exploring a newer version of myself. This one is a film that resonates with me for various reasons.

For starters, I was also sexually abused as a child, and the perpetrator was a close relative. I could relate to the lingering and stealthy effect of the trauma depicted on screen. I also disclosed this fact to my family after entering adulthood. The film’s portrayal of the family’s reaction mirrored my situation. Watching Veera intrepidly telling it like it is and being unapologetically ‘herself’ in the last scene was heart-wrenching yet therapeutic for me.  I have not allowed myself that outburst though. Not yet.

Last year, my father succumbed to his mental illness and committed suicide. I know what you mean when you say that Bhaati’s death was the ultimate liberation for Veera. My dad’s death had a similar effect on me. I faced one of my worst fears. Nothing really terrifies me anymore. It incidentally also happened to be the year when I confronted the reality of my troubled marriage. Two trips that followed set me free in many ways. The salt pan scene in the film set against the ‘Tu Kuja’ soundtrack echoed my sense of self-inquiry.  After watching this film, I was even more convinced that a journey from which you don’t completely return was exactly what I needed. Unlikely confidants, unlikely confidences, and accidental yet gratifying connections were a part of my journey as well.

The journey in ‘Highway’ unfolds like a map of tragedies that exist in us, unfurls.  It was a catharsis to observe the metaphorical ride from fragility to strength to nerve. I was nodding my head vigorously in agreement while watching the moments on screen where the lines between terror and wonder blurred for Veera. I noticed that Veera climbed many rocks in the film – big and small. I am assuming it metaphorically indicated overcoming obstacles and the joy of small victories. Many people couldn’t fathom Veera’s behavior – laughing interspersed with crying, and then questioning herself aloud like she was having an out-of-body experience. According to my reading, her emotional reactions were a part of the process of shedding the repressed parts of herself, and, embarking on the confusing yet exhilarating expedition of letting her real feelings come to the fore.  Liberation is a strange and an idiosyncratic process.

The silent scenes in the film aptly mirrored the way a meditative stillness seizes our inner world, when we travel. Then you stumble upon moments that break you before they make you. They unshackle. They teach you to trust your gut. It is important for life to whirl you around and turn your world upside down oftentimes.

Memory is not something that fades in my case. It looms large and I crouch in its towering shadow. This time I have decided to soar higher than this menacing force. Patakha Gudi has egged me on to unleash that spirit, which was hitherto tucked away and silenced.

I have just begun the task of developing my own vocabulary to express who I am. Thanks to Highway, I am propelling myself further in the direction of dismantling norms that don’t serve me.

Before I sound like a gushing obsessive fanatic, I should wrap it up. Your film will be a part of the trajectory that is turning me into a functional, healthy, and a fulfilled woman. Thank-you Imtiaz, Thank-you Highway. I know I will get there soon. Along the way, I will live like I mean it.

@kuhukuro